अल्फाज मेरे कोरे कागज पे उगने लगे
बाजार ए इश्क मे धड़ल्ले से बिकने लगे
थी मासूम और कोमल सी लेखनी मेरी
मगर मेरे राजदारों के पसीनें छूटने लगे
कभी ना चाहा था कोई छुपा रहे राज
मगर इत्तेफाकन सभी हमसे टूटने लगे
कभी नही लिखी कोई भी अल्फाज ऐसा
मगर अपने ही खफा हो हमसे रूठने लगे
जिसने नहीं देखी वफा ए जंग जिंदगी में
उल्फत ए चाह मे मेरे तहरीर लूटने लगे
राह ए वफा में देख मेरा जज्बा ए बुलंदी
मेंरे दुश्मनों के भी हौसले अब टूटने लगे