क्यों ना अपने घुटनों पर बैठ कर,
मुझे अपने साथ जिंदगी के,
सफर पर चलने की फरमाइश करते,
क्यों ना तुम कोई खूबसूरत सी,
अंगूठी अपनी उँगली में मुझसे पहन कर,
बांध लेते अपने एहसासों से...
क्यों ना तुम कुछ शब्द से सजा के,
कोई खत दे कर...
मुझसे प्यार का इकरार करते...
पर ऐसा तो कुछ भी नही किया तुमने,
आँखों ही आँखों में,
तुमने बाते दिल कि कह दी,
मैंने मान ली तुम्हारे साथ सफर पर,
चलने की फरमाइश...
मैं बंध गया तुम्हारे एहसासों में,
मैंने पढ़ लिए तुम्हारी आँखों में,
इकरार के सारे खत....
मैंने पढ़ ली तुम्हारी ख़ामोशी भी,
पर तुम मेरे शब्द भी ना पढ़ पाये....
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-मार्च है...!!